रविवार, 5 अप्रैल 2015
शनिवार, 28 फ़रवरी 2015
नवरात्री में नवदुर्गा अराधना
नवरात्रि के नौ दिनों में आदिशक्ति जगदम्बा के नौ रूपों की आराधना की जाती है। नवरात्र के प्रथम दिन शैल पुत्री, दूसरे दिन ब्रह्मचारिणी, तीसरे दिन चन्द्रघण्टा, चैथे दिन कुष्माण्डा, पाँचवे दिन स्कन्द माता, छठे दिन कात्यायनी, साँतवे दिन काल रात्रि, आँठवे दिन महागौरी तथा नवें दिन सिद्धिदात्री के रूप में आराधना किया जाता है।
यदि साधक नवरात्रि के नव दिनों तक माँ दुर्गा के नव रूपों की आराधना शास्त्रीय विधि विधान और पूर्ण निष्ठा, भक्ति के साथ करता है तो साधक को समस्त प्रकार की सिद्धियाँ स्वतः ही प्राप्त हो जाती है।
नवरात्रि के समय माँ दुर्गा की उपासना करने वाले साधकों को एक बात ध्यान देना चाहिए, यदि नव रात्र का प्रथम दिन अमावस युक्त हो तो उस दिन व्रत का अनुष्ठान नहीं करना चाहिए और यदि एकम् तथा द्विज एक ही दिन हो तो अत्यंत शुभ योग होता है।
नवरात्र में माँ दुर्गा की पूजा आराधना के लिए सर्वप्रथम एक मण्डप बनाएँ जो नौ हाथ लम्बा तथा सात हाथ चैडा हो, फिर बीच में एक वेदी भी बनाएँ जो चार हाथ लम्बा चैडा तथा एक हाथ ऊँचा हो। फिर मण्डप को गाय के गोबर से लीप कर ध्वजाओं से सजा लें तथा वेदी पर लाल आसन बिछा कर माँ दुर्गा की मूर्ति स्थापित करें तथा एक कलश की भी स्थापना करें। मण्डप के बीच में एक हवन कुंड भी बना लें।
फिर माँ आदिशक्ति जगदम्बा से प्रार्थना करें कि हे माता आदिशक्ति आप सर्वशक्तिमान हैं और जगत की माता भी हैं। मंै आपकी पूजा आराधना नवरात्रि के अवसर पर यथा शक्ति सम्पन्न करना चाहता हूँ। हे माता आप मेरी सहायता करें और आर्शीवाद प्रदान करें तथा इस पूजा आराधना में होने वाली त्रुटियों को क्षमा करें।
नवरात्र के प्रथम दिन एक, दूसरे दिन दो, तीसरे दिन तीन, इस तरह नव दिनों तक नौ, कुवाँरी कन्याओं का पूजन करना चाहिए । पूजन के पश्चात भोजन कराना चाहिए तथा वस्त्रादि भी दान में देना चाहिए साथ ही साथ माँ नवदुर्गा की उपासना पूर्णं शास्त्रोक्त विधि विधान से करनी चाहिए जिसका पूर्ण विधि विधान पुराणों में वर्णित है।
यदि नवरात्रि के समय नवदुर्गा के नव रूपों की आराधना नहीं कर पाते तो नवार्ण मंत्र की साधना कर पुर्ण लाभ उठा सकते हैं। नवार्ण मंत्र की साधना के लिए कोई लम्बा चैडा विधि-विधान नहीं है। नवार्ण मंत्र में नौदुर्गा के नव रूपों का बीजाक्षरों के रूप में पूर्ण समावेश किया गया है।
नवार्ण मंत्र को मंत्र तथा यंत्र दोनों रूपों में सिद्ध किया जा सकता है। नवार्ण यंत्र के सिद्धि के लिए नौ कोष्टक बनाकर नवार्ण मंत्र को लोम-विलोम रूप में स्थापित करना पड़ता है।
इस यंत्र को लिखने तथा मंत्र को जप करने से सम्पूर्ण सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हंै। नवरात्रि के नौ दिनों में इस यंत्र को नौ हजार बार लिखने से यह यंत्र सिद्ध हो जाता है।
यदि साधक नवरात्रि के नव दिनों तक माँ दुर्गा के नव रूपों की आराधना शास्त्रीय विधि विधान और पूर्ण निष्ठा, भक्ति के साथ करता है तो साधक को समस्त प्रकार की सिद्धियाँ स्वतः ही प्राप्त हो जाती है।
नवरात्रि के समय माँ दुर्गा की उपासना करने वाले साधकों को एक बात ध्यान देना चाहिए, यदि नव रात्र का प्रथम दिन अमावस युक्त हो तो उस दिन व्रत का अनुष्ठान नहीं करना चाहिए और यदि एकम् तथा द्विज एक ही दिन हो तो अत्यंत शुभ योग होता है।
नवरात्र में माँ दुर्गा की पूजा आराधना के लिए सर्वप्रथम एक मण्डप बनाएँ जो नौ हाथ लम्बा तथा सात हाथ चैडा हो, फिर बीच में एक वेदी भी बनाएँ जो चार हाथ लम्बा चैडा तथा एक हाथ ऊँचा हो। फिर मण्डप को गाय के गोबर से लीप कर ध्वजाओं से सजा लें तथा वेदी पर लाल आसन बिछा कर माँ दुर्गा की मूर्ति स्थापित करें तथा एक कलश की भी स्थापना करें। मण्डप के बीच में एक हवन कुंड भी बना लें।
फिर माँ आदिशक्ति जगदम्बा से प्रार्थना करें कि हे माता आदिशक्ति आप सर्वशक्तिमान हैं और जगत की माता भी हैं। मंै आपकी पूजा आराधना नवरात्रि के अवसर पर यथा शक्ति सम्पन्न करना चाहता हूँ। हे माता आप मेरी सहायता करें और आर्शीवाद प्रदान करें तथा इस पूजा आराधना में होने वाली त्रुटियों को क्षमा करें।
नवरात्र के प्रथम दिन एक, दूसरे दिन दो, तीसरे दिन तीन, इस तरह नव दिनों तक नौ, कुवाँरी कन्याओं का पूजन करना चाहिए । पूजन के पश्चात भोजन कराना चाहिए तथा वस्त्रादि भी दान में देना चाहिए साथ ही साथ माँ नवदुर्गा की उपासना पूर्णं शास्त्रोक्त विधि विधान से करनी चाहिए जिसका पूर्ण विधि विधान पुराणों में वर्णित है।
यदि नवरात्रि के समय नवदुर्गा के नव रूपों की आराधना नहीं कर पाते तो नवार्ण मंत्र की साधना कर पुर्ण लाभ उठा सकते हैं। नवार्ण मंत्र की साधना के लिए कोई लम्बा चैडा विधि-विधान नहीं है। नवार्ण मंत्र में नौदुर्गा के नव रूपों का बीजाक्षरों के रूप में पूर्ण समावेश किया गया है।
नवार्ण मंत्र को मंत्र तथा यंत्र दोनों रूपों में सिद्ध किया जा सकता है। नवार्ण यंत्र के सिद्धि के लिए नौ कोष्टक बनाकर नवार्ण मंत्र को लोम-विलोम रूप में स्थापित करना पड़ता है।
इस यंत्र को लिखने तथा मंत्र को जप करने से सम्पूर्ण सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हंै। नवरात्रि के नौ दिनों में इस यंत्र को नौ हजार बार लिखने से यह यंत्र सिद्ध हो जाता है।
साधना विधि- नवरात्रि के प्रथम दिन पूजा स्थान में स्नान आदि से निवृत हो कर माँ दुर्गा के चित्र के समक्ष बैठ जायें, फिर एक ताम्र पत्र पर नवार्ण यंत्र खुदवाकर रखें, तत्पश्चात् माँ दुर्गा की षोड़शोपचार से पूजन करें फिर संक्ल्प कर माँ दुर्गा का ध्यान तथा विनियोग करें तथा नवार्ण यंत्र को 1 हजार बार कागज पर लिखें, फिर नवार्ण मंत्र की 11 माला चप करें।
मंत्र- ऐं हृीं क्लीं चामुण्डाय विच्चै।।
इसी प्रकार नौ दिनों यंत्र का निमार्ण तथा मंत्र का जप करें। उसके बाद नित्य 101 बार नवार्ण मंत्र का जप करते रहने से जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में पूर्ण सफलता प्राप्त होती है। इसमें कोई संदेह नहीं। लेखक- प्रदीप गोस्वामी (संपादक- रहस्यों के खोज में, आध्यात्मिक पत्रिका) मो.न.09753640635
मंत्र- ऐं हृीं क्लीं चामुण्डाय विच्चै।।
इसी प्रकार नौ दिनों यंत्र का निमार्ण तथा मंत्र का जप करें। उसके बाद नित्य 101 बार नवार्ण मंत्र का जप करते रहने से जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में पूर्ण सफलता प्राप्त होती है। इसमें कोई संदेह नहीं। लेखक- प्रदीप गोस्वामी (संपादक- रहस्यों के खोज में, आध्यात्मिक पत्रिका) मो.न.09753640635
शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2015
चमत्कारिक है डाऊजिंग कला
डाउसिग एक प्राचिन कला है, जिसके द्वारा पारंपरिक तरीकों से जानकार व्यक्ति जमीन में पानी के श्रोतों का पता लगाने मे किया करते थे। कुछ लोग इसके माध्यम से मकान बनाने से पहले उस भूमी के गुण दोषों का पता लगाने तथा जमीन मे गड़े हुए खजानें का पता लगाने मे भी किया करते थे।
आज भी गावों मे धर बनाने, कुंआँ खोदने बोरबेल कराने से पहले किसी जानकार व्यक्ति से डस स्थान का विषेश प्रक्रिया द्वारा जांच कराया जाता है। स्थल का जांच करने वाला व्यक्ति नारियल को हाथ मे लेकर उस जगह के आस पास घुमता है, और जहाँ पर पानी का अच्छा श्रोत हो वहाँ पर नारियल स्वयं घुमने लगता है। <p style="border-top: 7px solid rgb(92, 138, 100); border-bottom: 7px solid rgb(92, 138, 100); margin: 10px; font-weight: bold; font-size: 12pt; float: right; padding-bottom: 7px; width: 200px; line-height: 100%; padding-top: 7px; text-align: center;">....डाउजिंग के द्वारा किसी भी घटना, समस्या, वास्तुकला ,जीवन साथी का चुनाव वरवधु मिलान, मुकदमे में सफलता असफलता, दोस्त और दुश्मनों की पहचान सब कुछ मालुम किया जा सकता है।:)</p>इसी प्रकार स्थल जांच करने की अनेकों विधियाँ गांवो मंे प्रचलित है। कई लोग मोरपंख, लकड़ी, अगरबत्ती, नरियल आइना अथवा अक्षत के द्वारा भी स्थल का निरिक्षण किया करते हैं, यह सब डाउसिंग कला के ही रूप हैं।
डाउसिंग के द्वारा किसी भी प्रकार के प्रश्नों का उत्तर प्राप्त किया जा सकता है जैसे जमीन के अंदर कितने फुट पर पानी है, कितना पानी है, पानी मीठा है या खारा इत्यादि सभी प्रकार की जानकरी प्राप्त किया जा सकता है। डाउजिंग के द्वारा किसी भी घटना, समस्या, वास्तुकला ,जीवन साथी का चुनाव वरवधु मिलान, मुकदमे में सफलता असफलता, दोस्त और दुश्मनों की पहचान सब कुछ मालुम किया जा सकता है।
कुछ मनुष्यो में डाउसिंग शक्ति बचपन से ही जाग्रत रहती है जिसे साधना के द्वारा विकसित किया जा सकता है।
अरब देश के एक पेट्रोल के कुयें तलाशने वाले अफ्रीकी डाउजर को पानी का कुँआं तलासने पर अरब के एक शेख ने करोड़ो रूपये का इनाम दिया। यह विडियो सात साल पहले डिस्कवरी चैनल पर प्रसारित हुटा था। अरब देश मे पेट्रोल से महंगा पानी है। लेखक- प्रदीप गोस्वामी (संपादक- रहस्यों के खोज में, आध्यात्मिक पत्रिका) मो.न.09753640635
अलौकिक सिद्ध पारदेश्वर मंदिर
सरगुजा जिले के राजधानी अम्बिकापुर से 40 कि. मी. दूर उत्तर दिशा में स्थित प्रतापपुर क्षेत्र के बांक नदी के पावन तट पर स्थित है एक अलौकिक पारदेश्वर शिव मंदिर, जिसकी अलौकिकता और भव्यता साधकांे को मंत्रमुग्ध सा कर देता है।
इस मंदिर की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इस मंदिर के सभी मूर्ति तथा शिवलिंग अष्ट संस्कार सम्पन्न पारद से बने हुए है जिसमें भगवान शंकर माता पार्वती गणपती तथा कार्तिकेय जी के प्रतिमा के साथ स्वामी निखिलेश्वरानन्द महाराज जी की भव्य प्रतिमा भी स्थापित है। साथ ही साथ 11 कि.ग्रा. का चरण पादुका तथा दो पारद शिवलिंग है जिसमें 1 पारद शिवलिंग का वजन 21 कि.ग्रा. है तथा दूसरे का 151 कि.ग्रा. है, तथा पारद शिवलिंग के सामने ही 51 कि.ग्रा. पारे से बना नन्दी भी विराजमान हैं।
ऐसा दुर्लभ और अलौकिक पारदेश्वर मंदिर विश्व में शायद ही कहीं देखने को मिल सकता है। पुराणों में भी पारदेश्वर भगवान का बखान करते हुये कहा गया है कि जो व्यक्ति अपने जीवन में मात्र एक बार भी पारदेश्वर शिवलिंग का दर्शन कर ले उसके जन्म जन्मान्तर के करोड़ो पाप समाप्त हो जाते हैं तथा उसका जीवन धन्य हो जाता है तथा उसके घर में कभी भी दरिद्रता नहीं आती।
परम पूज्य सद्गुरूदेव डाॅ. नारायण दत्त श्रीमाली जी के पावन कर कमलों द्वारा प्रदत्त पारदेश्वर शिवलिंग तथा पूज्य गुरूदेव श्री नंदकिशोर श्रीमाली जी एवं श्री अरविन्द श्रीमाली जी के द्वारा 8 सितम्बर सन् 2000 को विशेष मंत्रो द्वारा प्राण प्रतिष्ठित कर स्थापित किया गया। तब से लगातार मंदिर के सेवक श्री मुरलीधर पाण्डेय जी के द्वारा विधि विधान से पूजन आरती नित्य किया जा रहा है। प्रत्येक माह के 21 तारीख को 25 लीटर गौ दूध से भगवान पारदेश्वर का रूद्राभिषेक किया जाता है। यह लगातार कई वर्षांे से चला आ रहा है। तथा प्रत्येक वर्ष गुरू जन्म दिवस के अवसर पर 21 अप्रैल को भव्य पूजन तथा हवन का कार्यक्रम सरगुजा के समस्त गुरू भाईयों के द्वारा किया जाता है। इस मंदिर में समय समय पर साधकों को अनेकांे प्रकार के अलौकिक अनुभव होते रहते हैं।
मेरा स्वंय का अनुभव है कि इस मंदिर में स्थापित पारदेश्वर भगवान का पूजन करने से जीवन की समस्त समस्याएँ समाप्त हो जाती है, तथा सभी मनोकामनाएँ पूर्ण हो जाती हंै।
ग्रन्थों में पारदेश्वर शिवलिंग को दुनिया का सबसे दुर्लभ और अद्वितीय बताया गया है। भगवान शिव के द्वादश ज्योतिलिंगो का सार तथा दुनिया में जितना भी शिव विग्रह स्थापित है। उन सभी स्वरूपों में सर्व श्रेष्ठ स्वरूप भगवान पारदेश्वर को ही माना गाया है।
जिसके बारे में वेदो पुराणों तथा उपनिषदों में अनेकों प्रकार से गुण गान करते हुये कहा गया है कि कोई व्यक्ति चाहे कितना ही बड़ा अधर्मी या पापी हो या दुष्ट हो चाहे जीवन में कितने ही छल, कपट, अत्याचार, दुराचार, हत्या, गोहत्या या बह्महत्या जैसा भी पाप क्यों न किया हो वह व्यक्ति भी अगर मात्र एक बार पूर्ण श्रध्दा विश्वास के साथ भगवान पारदेश्वर का पूजन अथवा दर्शन मात्र कर ले तो उसके जीवन के सारे पाप दोष एक पल में ही पूर्णतः समाप्त हो जाते हैं। तथा उस व्यक्ति में दिव्यता और पवित्रता का संचार होने लगता है।
हमारे वेदों और पुराणों में पारद से निर्मित मूर्तियों और शिवलिंग के दर्शन तथा पूजन के बारे में जो कुछ भी वर्णित है वह नीचे प्रस्तुत कर रहा हूँ।
शिव निर्णय रत्नाकर:-
मदः कोटिगुणं स्वर्णं स्वर्णात्कोटिगुणं मणिः।
मणेः कोटिगुणं बाणो बालाल्कोटिगुणं रसः।
रसात्परतरं लिंग न भुतो न भविश्यति।।
अर्थात मिट्टी अथवा पत्थर के शिवलिंग के पुजन करके करोड़ों गुणा
अधिक फल स्वर्ण निर्मित शिवलिंग के पुजन से मिलता है स्वर्ण से करोंड़ो गुना अधिक फल मणि और मणि से करोड़ो गुणा अधिक फल बाल लिंग नर्मदेश्वर के पूजन से प्राप्त होता है तथा नर्मदेश्वर बाललिंग से भी करोड़ो गुणा अधिक फल पारद शिवलिंग के पूजन या दर्शन से ही प्राप्त हो जाता है।
रसरत्नसमुच्चय
विधाय रस लिंगं यो भक्ति युक्तःसमचयेत्।
जगत्त्रितयलिंगगाना पूजाफलम वारनुयात्।।
अर्थात् जो भक्ति और श्रध्दा के साथ पारदशिवलिंग की पूजा करता है उसे तीनों लोकों में स्थित शिवलिंग की पूजा का फल प्राप्त होता है तथा उसके समस्त महापाप नष्ट हो जाते है।
रसमार्तण्ड़ लिंग कोटि सहस्त्र यत्फलं सम्यगचनात्।
तत्फलं कोटिगुणितं रसलिंगार्चनाद् भवेत्।।
ब्रह्मत्यासहस्त्राणि गोहव्याशतानि च।
तत्क्षणाद्वलयं यन्ति रसलिंगस्य दर्शनात्।।
स्पशनात्प्राप्यते मुक्तिरिती सत्यं शिवोदितम्।।
अर्थात् हजारों करोड़ो शिवलिंगो की पूजा करने से जो फल प्राप्त होता है उससे भी करोड़ो गुना अधिक फल पारद शिवलिंग के पूजन से प्राप्त होता है तथा हजारों ब्रह्म हत्याओं और गो हत्याओं का किया गया पाप भी पारद शिवलिंग के मात्र दर्शन करते ही समाप्त हो जाता है तथा पारदशिवलिंग के स्पर्श या पूजन करने से निश्चय ही समस्त प्रकार के भव बंधन से छुटकारा मिल जाता है।
वायवीय संहिता
आयुरायेग्यमैश्वर्यं यच्चान्यदपि वांछिच्तम्।
रसलिंगाचनादिष्टं सर्वतं लभेत नरः।।
अर्थात आयु आरोग्य ऐश्वर्य तथा अन्य जो भी मनो वांछित वस्तुएं है। वे सभी वस्तुएँ पारद शिवलिंग के पूजन से सहज ही प्राप्त हो जाती है।
ब्रह्म पुराण
धन्यास्ते पुरूषाः लोके येअर्चयंति रसेश्वरम्।
सर्वपापहरं देवं सर्व कामफलप्रदम्।।
ब्रह्मणाः क्षत्रियाः वैश्यास्त्रियः शुद्रान्त्यजादयः।
सम्पूज्य तं सुखम प्राप्नुवन्ति परां गतिम्।।
अर्थात संसार में मनुष्य धन्य है जो समस्त मनोवांछित फलों को देने वाले पारद शिवलिंग का पूजन दर्शन करते हैं, उनके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं।
ब्रह्मवैवर्त पुराण – पच्यतेकाम सुत्रेण यावच्चदिवाकरौ। कृत्वा लिंग सकृत पूज्यं वसेत्काल्पसतं दिवि।।
प्रजावान भुमिवान् पुत्र बांधववास्तथा।
ज्ञानवान् मुक्विान् साधुःरसलिंगार्चनाद् भवंत्
अर्थात् जो मनुष्य एक बार भी अपने जीवन में विधि विधान से पूजन कर लेता है उसे जीवन का पुर्ण सुख प्राप्त होता है तथा उसे जीवन में धन, यश, मान, सम्मान, पद प्रतिष्ठा, पुत्र-पौत्र, विद्या आदि की कोई कमी नहीं रहती। अन्त में निश्चित ही मुक्ति प्राप्त कर लेता है।
योगशिखोपनिषद्
रसलिंगमहालिंग शिवशक्ति निकेतनम्
लिंग शिवालय प्रीवन्त सिद्धिदं सर्वदेहिनाम्।
अर्थात् रस ही महालिंग है और इसे पुराणों ने भगवान शिव का शिवालय माना है। जिसके प्राप्त होने पर सम्पूर्ण सिद्धियाँ स्वतः प्राप्त हो जाती है।
रस राज चिन्तामणि
ब्रह्मज्ञानेन सो युक्तों यः पापी रसनिंदकः।
नहि त्राता भवैतस्य जन्म कोटिशतैरपि।।
अर्थात् जो व्यक्ति अपने जीवन में पारद शिवलिंग की भूल से भी निंदा करता है उसे धोर पापी समझना चाहिए ऐसा व्यक्ति पारद के क्षेत्र में सफलता पा नहीं सकता और ऐसा व्यक्ति चाहे किसी भी प्रकार की साधना करले मृत्यु से उसको ब्रह्मा भी नहीं बचा सकता।
रस सार पद्धति
रससार पद्धति नामक ग्रन्थ में दो टूक शब्दों में कहा गया है कि –
दशनादशराजस्य बह्मा हत्या ल्यपोहति।
स्पर्शनोन्नाशपेद्देवी गोहथा नात्र संशयः।
किं पुनंमक्षणादेवी प्राप्यते प्रारंभ पदम्।।
अर्थात् पारद शिवलिंग का दर्शन तथा पूजन, ब्रह्म हत्या के दाषोेेें को भी नष्ट कर देता है। इसके दर्शन तथा स्पर्श से पूर्व जन्मकृत समस्त पापों का नाश हो जाता है, और यदि पारद शिवलिंग पर चढ़े हुए जल दूध या पंचामृत का सेवन कर लिया जाये तो व्यक्ति को सम्पूर्ण सुख और परमपद की प्राप्ति होती है।
शताश्वमेधेन कृतेन पुण्यंगोकोटिभीः स्वर्णयहस्त्र प्रदानात ।
नृणां भवेत्सूतक दर्शनेन यत्सर्वतीथेषु कृताभिषेकात
अर्थात् जो पुण्य 100 अश्वमेध यज्ञ करने, करोडों गोदान करने तथा हजारों तोला स्वर्ण दान करने से प्राप्त होता है वही पुण्य भगवान पारदेश्वर के दर्शन मात्र से सहज ही प्राप्त हो जाता हैै।
रावण भी पारद का अष्ट संस्कार शोधन संपन्न कर पारदेश्वर शिवलिंग का निर्माण कर नित्य पूजन किया करता था तथा उसी पारदेश्वर भगवान की कृपा से अपनी पूरी लंका नगरी को सोने में परिर्वतित कर दिया और साबित कर दिया कि भगवान पारदेश्वर की कृपा से सब कुछ संभव हो सकता है। यदि वास्तव मंे देखा जाए तो भगवान पारदेश्वर का दर्शन अथवा पूजन करना जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य तथा सबसे बडी़ श्रेष्ठता है, और मेरे स्वयं का मानना है कि जब मनुष्य के सात जन्मों का पुण्य जोर मारता है तब कहीं भगवान पारदेश्वर का दर्शन संभव हो पाता है। पारदेश्वर शिवलिंग को संसार का सबसे दिव्य, दुर्लभ तथा अद्वितिय शिवलिंग माना गया है। जो संपुर्ण मानव जाति के लिए वरदान स्वरूप है।
संसार की समस्त वस्तुएँ कुछ मेहनत और प्रयास से प्राप्त किए जा सकते हैं, मगर पारदेश्वर शिवलिंग का दर्शन तो जन्म जन्मांतर के पुण्यों के प्रताप और भगवान शंकर के असीम कृपा से ही संभव हो सकता है।
यदि आपके मन में पारदेश्वर शिवलिंग के दर्शन करने की इच्छा भी जागृत हो जाये तो समझ लिजिए कि आप के जीवन में सोभाग्य का उदय होने लगा। जिस दिन से आपके मन में भगवान पारदेश्वर का दर्शन या पूज
न करने की दृढ़ इच्छा शक्ति जागृत हो जाय उसी क्षण से आपके पुण्यों का उदय और पापों का समन होने लगता है। लेखक- प्रदीप गोस्वामी (संपादक- रहस्यों के खोज में, आध्यात्मिक पत्रिका) मो.न.09753640635चोर पकड़ने का चमत्कारिक प्रयोग
ॐ नाहर सिंह वीर हरै कपडे ॐ नाहर सिंह वीर चावल चपड़े सरसों के फक-फक करै सार को छोड़े चोर को पकड़े आदेश गुरू को।
विधी- इस मंत्र को सिद्ध करने का तरीका यह है कि चाँदी का एक सिक्का लें जिसमें छेद न हो, फिर इसे दूध तथा गंगा जल से धोकर धूप, लोबान जलाकर पूजन करें तत्पश्चात् शनि पुष्य नक्षत्र के दिन गोबर से जमीन को लीप कर उस पर सफेद कपड़ा बिछाकर दूध से धोकर सुखाया गया चावल रख कर उसी पर चाँदी का सिक्का भी रख दे फिर लोबान धूप गुगुल जलाकर उक्त मंत्र का 108 बार जप करें। जब प्रयोग करना हो तब या किसी चोर की पहचान करना हो तो उन्ही चावलो पर सात बार मंत्र पढ़ते हुये उसी चाँदी के सिक्के के बराबर चावल तौल कर जिस व्यक्ति पर शक हो उन्हे थोड़ा-थोड़ा चबवा दें। जिसने भी चोरी किया होगा उसके मुह से निश्चय ही खून गिरने लगेगा। (यह प्रयोग अनुभूत तथा प्रमाणिक है) लेखक- प्रदीप गोस्वामी (संपादक- रहस्यों के खोज में, आध्यात्मिक पत्रिका) मो.न.09753640635
सर्वकार्य सिद्धि शाबर मंत्र प्रयोग
होली की रात्रि में स्नान आदि से निवृत होकर साधना कक्ष में धूप दीप आदि जलाकर गुरू स्थापना तथा गुरू पूजन कर निम्न सर्वकार्य सिद्धि मंत्र का प्रयोग करें।
मंत्र- ॐ नमो सात समुन्द्र के बीच शिला, शिला के ऊपर सूलेमान पैगम्बर बैठा। सुलेमान पैगम्बर के चार मवक्किलतारिया, सारिया, जारिया, जमारिया। एक मवक्किल पूर्व को धाया देव-दानव को बाधिलाया दूसरा मवक्किल आश्रम को धाया भूत-प्रेत बाधि लाया तीसरा मवक्किल दक्षिण को धाया डाकिनी शाकिनी को पकडि लाया चारि मवक्किल चहुँ दिशी धावै। छल छिद्र मोऊ रहन न पावै रोग-दोष को बहावे शब्द साचा पिण्ड काचा। फुरो मंत्र ईश्वरो बाचा।
विधि- उक्त मंत्र का विधि विधान से किया जाना चाहिए। सर्वप्रथम कपड़े के चार पुतले बनाये फिर उन चारो पुतलांे को रात्रि के समय चारों कोनो में गाड़़ दें। तत् पश्चात् धूप-दीप जलाकर उक्त मंत्र का 108 बार जाप करें ऐसा करने से यह मंत्र सिद्ध हो जाता है और आपके सारे कार्य स्वयं सिद्ध होने लगते हैं। लेखक- प्रदीप गोस्वामी (संपादक- रहस्यों के खोज में, आध्यात्मिक पत्रिका) मो.न.09753640635
मंत्र- ॐ नमो सात समुन्द्र के बीच शिला, शिला के ऊपर सूलेमान पैगम्बर बैठा। सुलेमान पैगम्बर के चार मवक्किलतारिया, सारिया, जारिया, जमारिया। एक मवक्किल पूर्व को धाया देव-दानव को बाधिलाया दूसरा मवक्किल आश्रम को धाया भूत-प्रेत बाधि लाया तीसरा मवक्किल दक्षिण को धाया डाकिनी शाकिनी को पकडि लाया चारि मवक्किल चहुँ दिशी धावै। छल छिद्र मोऊ रहन न पावै रोग-दोष को बहावे शब्द साचा पिण्ड काचा। फुरो मंत्र ईश्वरो बाचा।
विधि- उक्त मंत्र का विधि विधान से किया जाना चाहिए। सर्वप्रथम कपड़े के चार पुतले बनाये फिर उन चारो पुतलांे को रात्रि के समय चारों कोनो में गाड़़ दें। तत् पश्चात् धूप-दीप जलाकर उक्त मंत्र का 108 बार जाप करें ऐसा करने से यह मंत्र सिद्ध हो जाता है और आपके सारे कार्य स्वयं सिद्ध होने लगते हैं। लेखक- प्रदीप गोस्वामी (संपादक- रहस्यों के खोज में, आध्यात्मिक पत्रिका) मो.न.09753640635
रहस्यमयी भुतहा किला भानगढ़
राजस्थान के जयपुर के अल्वर जिले में स्थीत खौफनाक और रहस्यमयी किला जिसे भानगढ़ का किला कहा जाता है। इस किले की रोमांचकारि कहानी मन को इस कदर भयभीत कर देती है कि कोइ भी व्यक्ति रात के वक्त इस किले के आस-पास फटकने की हिमाकत नही कर सकता। आखिर क्या है इस भुतहा किले का रहस्य जो लोगों के लिए भय और आतंक का कारण बनाा हुआ है।
भानगढ़ राजपूति आन-बान और शान माने जाने वाले राजस्थान के उत्तर-पूर्वी सघन वन क्षेत्र सरिका रास्ट्रीय उद्यान के दक्षिण छोर पर अरावली के पहाड़ीयों के बीच एक रहस्यमय खण्डहर शहर के रूप मे मौजूद है। कहने को तो यहाँ बाजार, महल, बाग-बगिचे कूएं-बावडि़यां महल हवेली सब कुछ है। लेकिन सब के सब खण्डहर। मानो रातो रात यह शहर उजड़ गया हो। इस किले से संबंधित अनेकों किस्से कहानीया प्रचलीत हैं। स्थानिय लोगो में धारणा है कि यह किला शापित है। जिसके कारण लोग भयभीत रहते है।
ृ भानगढ़ के किले का निर्माण अतित के आगोस में सत्रहवीं सताब्दी में राजा माधव सिंह के द्वारा कराया गया था। राजा माधव सिंह उस समय अकबर के सेना में जनरल के पद पर तैनात थे उस समय भानगढ़ की जनसंख्या तकरीबन 10.000 थी। चारों तरफ से पहाड़ों से घीरे विशाल किले में बेहतरीन शिल्प कलाओं का प्रयोग किया गया है, साथ ही साथ इस किले मे भगवान शिव तथा हनुमान जी का अति प्राचिन मंदिर भी है। इस किले में कुल पाँच द्वार तथा एक मुख्य दिवार है।
किवदंतियों के अनुसार भानगढ़ के किले पर काले जादूगर सिंधीया का श्राप है देखने मे यह किना जितना शानदार है इसका अतित भी उतना ही भयानक है। इस किले से संबंधित एक कहानी के अनुसार भानगढ़ की राजकुमारी रत्नावती अत्यंत सुदर और रूपवान थी उसके सुन्दरता की चर्चा पूरे राज्य मे थी। देश के अनेकों राजकुमार उससे विवाह करना चाहते थे। उस समय वह 18 वर्ष की थी और उसका यौवन उसके खुब सुरती पर चार चाँद लगा रहे थे।
एक बार की बात है राजकुमारी रत्नावती अपने सखीयों के साथ एक इत्र के दुकान पर जाकर हाथों मे इत्र लेकर उसकी खुशबू ले रही थी तभी सिंधीया नाम का एक व्यक्ति उसे कुछ दुर से बड़े गौर से निहार रहा था। सिंधीया उसी राज्य में रहता था और काले जादू में उसे महारथ हासिल थी। राजकुमारी को देखकर वह उस पर मोहित हो गया और किसी भी प्रकार से राजकुमारी को हासिल करने की कोशिस करने लगा। एक दिन उसने राजकुमारी के पसंदीदा इत्र में काला जादू कर राजकुमारी को अपने वश में करना चाहता था। परंतु इस बात की भनक राज कुमारी को लग गई तब उसने इत्र के उस बोतल को एक पत्थर पर पटक दिया जिससे बोतल टुट गई और सारा इत्र पत्थर पर बिखर गया देखते ही देखते काले जादू के प्रभाव से वह पत्थर फिसलने लगा और फिसलते हुए जादूगर सिंधीया के पास जा पहुंचा।
राज कुमारी भी पत्थर के पिछे-पिछे सिंधीया तक पहुंच गई और उसे मौत के घाट उतार दिया, परंतु मरते-मरते जादूगर सिंधीया श्राप दे गया कि इस किले में रहने वाले सभी लोगों का विनाश हो जायेगा और मरने के बाद भी उनकी आत्माएं इस किले में भटकती रहेंगी। उन्हे कभी मुक्ति नही मिलेगी।
जादूगर सिंधीया के मौत के कुछ दिनो के बाद ही भानगढ़ और अजबगढ़ के बीच भयानक युद्ध हुआ जिससे किले में रहने वाले सभी लोग मारे गये, यहाँ तक कि राजकुमारी रत्नावती भी उस श्राप से नही बच पाई और उसकी भी मौत हो गई। एक साथ इतने बड़े कत्ले आम के बाद किले में मौत का सन्नाटा छा गया और आज भी उनकी अतृप्त आत्माएं घुमती रहती हैं।
इस किले से लोग इतना आतंकित हैं कि प्रसासन के द्वारा भी सतर्क रहने की हिदायत दी गई है। इस किले में सुर्यास्त के बाद प्रवेश पर प्रतिबंध है। फिलहाल इस किले की देख-रेख भारत सरकार के द्वारा की जाती है तथा किले के चारों तरफ आर्कियो लाजिकल सर्वे आफ इंडिया की टीम हमेशा मौजूद रहती है। ए.एस.आई.टीम ने बकायदा एक साइन बोर्ड पर सख्त हिदायत लिख रखी है कि इस इलाके में शाम होने के बाद रूकने की सख्त मना है।
कहा जाता है कि इस किले मे शाम होने के बाद जो भी गया वह कभी वापस नही आया। इस किले मे अब तक अनेकों लोगों को जान से हाथ धोना पड़ा है। लोगो का मानना है कि इस किले मे कत्ले आम में मारे जाने वाले लोगों की रूहों का कब्जा है, आज भी उस किले में भटकती आत्माएं दिखाईदे जाती हैं। इस तथ्य की सच्चाई को परखने के लिए कई बार भारत सरकार के अर्ध सैनिक बलो के द्वारा प्रयास किया गया। परंतु वे भी असफल रही। सैनिकों ने भी किले मे रूहों के होने की बात को स्वीकारा है। कहा जाता है कि आज भी उस इलाके में तलवारो के आपस में टकराने की आवाजें तथा चीख पुकार सुनाई देती है। लेखक- प्रदीप गोस्वामी (संपादक- रहस्यों के खोज में, आध्यात्मिक पत्रिका) मो.न.09753640635
भानगढ़ राजपूति आन-बान और शान माने जाने वाले राजस्थान के उत्तर-पूर्वी सघन वन क्षेत्र सरिका रास्ट्रीय उद्यान के दक्षिण छोर पर अरावली के पहाड़ीयों के बीच एक रहस्यमय खण्डहर शहर के रूप मे मौजूद है। कहने को तो यहाँ बाजार, महल, बाग-बगिचे कूएं-बावडि़यां महल हवेली सब कुछ है। लेकिन सब के सब खण्डहर। मानो रातो रात यह शहर उजड़ गया हो। इस किले से संबंधित अनेकों किस्से कहानीया प्रचलीत हैं। स्थानिय लोगो में धारणा है कि यह किला शापित है। जिसके कारण लोग भयभीत रहते है।
ृ भानगढ़ के किले का निर्माण अतित के आगोस में सत्रहवीं सताब्दी में राजा माधव सिंह के द्वारा कराया गया था। राजा माधव सिंह उस समय अकबर के सेना में जनरल के पद पर तैनात थे उस समय भानगढ़ की जनसंख्या तकरीबन 10.000 थी। चारों तरफ से पहाड़ों से घीरे विशाल किले में बेहतरीन शिल्प कलाओं का प्रयोग किया गया है, साथ ही साथ इस किले मे भगवान शिव तथा हनुमान जी का अति प्राचिन मंदिर भी है। इस किले में कुल पाँच द्वार तथा एक मुख्य दिवार है।
किवदंतियों के अनुसार भानगढ़ के किले पर काले जादूगर सिंधीया का श्राप है देखने मे यह किना जितना शानदार है इसका अतित भी उतना ही भयानक है। इस किले से संबंधित एक कहानी के अनुसार भानगढ़ की राजकुमारी रत्नावती अत्यंत सुदर और रूपवान थी उसके सुन्दरता की चर्चा पूरे राज्य मे थी। देश के अनेकों राजकुमार उससे विवाह करना चाहते थे। उस समय वह 18 वर्ष की थी और उसका यौवन उसके खुब सुरती पर चार चाँद लगा रहे थे।
एक बार की बात है राजकुमारी रत्नावती अपने सखीयों के साथ एक इत्र के दुकान पर जाकर हाथों मे इत्र लेकर उसकी खुशबू ले रही थी तभी सिंधीया नाम का एक व्यक्ति उसे कुछ दुर से बड़े गौर से निहार रहा था। सिंधीया उसी राज्य में रहता था और काले जादू में उसे महारथ हासिल थी। राजकुमारी को देखकर वह उस पर मोहित हो गया और किसी भी प्रकार से राजकुमारी को हासिल करने की कोशिस करने लगा। एक दिन उसने राजकुमारी के पसंदीदा इत्र में काला जादू कर राजकुमारी को अपने वश में करना चाहता था। परंतु इस बात की भनक राज कुमारी को लग गई तब उसने इत्र के उस बोतल को एक पत्थर पर पटक दिया जिससे बोतल टुट गई और सारा इत्र पत्थर पर बिखर गया देखते ही देखते काले जादू के प्रभाव से वह पत्थर फिसलने लगा और फिसलते हुए जादूगर सिंधीया के पास जा पहुंचा।
राज कुमारी भी पत्थर के पिछे-पिछे सिंधीया तक पहुंच गई और उसे मौत के घाट उतार दिया, परंतु मरते-मरते जादूगर सिंधीया श्राप दे गया कि इस किले में रहने वाले सभी लोगों का विनाश हो जायेगा और मरने के बाद भी उनकी आत्माएं इस किले में भटकती रहेंगी। उन्हे कभी मुक्ति नही मिलेगी।
जादूगर सिंधीया के मौत के कुछ दिनो के बाद ही भानगढ़ और अजबगढ़ के बीच भयानक युद्ध हुआ जिससे किले में रहने वाले सभी लोग मारे गये, यहाँ तक कि राजकुमारी रत्नावती भी उस श्राप से नही बच पाई और उसकी भी मौत हो गई। एक साथ इतने बड़े कत्ले आम के बाद किले में मौत का सन्नाटा छा गया और आज भी उनकी अतृप्त आत्माएं घुमती रहती हैं।
इस किले से लोग इतना आतंकित हैं कि प्रसासन के द्वारा भी सतर्क रहने की हिदायत दी गई है। इस किले में सुर्यास्त के बाद प्रवेश पर प्रतिबंध है। फिलहाल इस किले की देख-रेख भारत सरकार के द्वारा की जाती है तथा किले के चारों तरफ आर्कियो लाजिकल सर्वे आफ इंडिया की टीम हमेशा मौजूद रहती है। ए.एस.आई.टीम ने बकायदा एक साइन बोर्ड पर सख्त हिदायत लिख रखी है कि इस इलाके में शाम होने के बाद रूकने की सख्त मना है।
कहा जाता है कि इस किले मे शाम होने के बाद जो भी गया वह कभी वापस नही आया। इस किले मे अब तक अनेकों लोगों को जान से हाथ धोना पड़ा है। लोगो का मानना है कि इस किले मे कत्ले आम में मारे जाने वाले लोगों की रूहों का कब्जा है, आज भी उस किले में भटकती आत्माएं दिखाईदे जाती हैं। इस तथ्य की सच्चाई को परखने के लिए कई बार भारत सरकार के अर्ध सैनिक बलो के द्वारा प्रयास किया गया। परंतु वे भी असफल रही। सैनिकों ने भी किले मे रूहों के होने की बात को स्वीकारा है। कहा जाता है कि आज भी उस इलाके में तलवारो के आपस में टकराने की आवाजें तथा चीख पुकार सुनाई देती है। लेखक- प्रदीप गोस्वामी (संपादक- रहस्यों के खोज में, आध्यात्मिक पत्रिका) मो.न.09753640635
सदस्यता लें
संदेश (Atom)



